एक साल तक सोना न खरीदने की प्रधानमंत्री की अपील से बढ़ी चर्चा, गोल्ड-सिल्वर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव
11 May 2026
देशभर में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या अभी सोना खरीदना सही रहेगा या कुछ समय इंतजार करना बेहतर होगा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi की एक बड़ी अपील ने गोल्ड मार्केट में नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से कम से कम एक साल तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने की अपील की है। इसके बाद घरेलू बाजार से लेकर निवेशकों तक हर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आने वाले दिनों में सोने की कीमतों का रुख क्या रहने वाला है।
सोमवार, 11 मई 2026 को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और सर्राफा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज हलचल देखने को मिली। ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे बाजार की चिंता और बढ़ गई। शादी-ब्याह की तैयारियों में जुटे परिवारों से लेकर निवेशकों तक, सभी की नजर अब गोल्ड और सिल्वर के अगले ट्रेंड पर टिकी हुई है।
हैदराबाद में पीएम मोदी की बड़ी अपील
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने 10 मई 2026 को Hyderabad में लगभग 9,400 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के उद्घाटन के दौरान लोगों से अपील की कि वे कम से कम एक वर्ष तक सोने की खरीदारी टालने की कोशिश करें। उन्होंने कहा कि भारत बड़ी मात्रा में सोना विदेशों से आयात करता है, जिससे देश की विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है।
प्रधानमंत्री ने खासतौर पर उन परिवारों से भी आग्रह किया जिनके घरों में शादियां होने वाली हैं। उन्होंने कहा कि यह कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं, बल्कि देशहित में की गई नैतिक अपील है। उनका संदेश साफ था कि मौजूदा वैश्विक संकट के समय देश को विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत है और गैर-जरूरी खर्चों को कुछ समय के लिए टालना बेहतर होगा।
आखिर क्यों दी गई सोना न खरीदने की सलाह?
सरकार की चिंता का सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई पर असर है। होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुए संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जबकि हाल के दिनों में यह 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी छू चुकी हैं।
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल और सोना दोनों ही ऐसे उत्पाद हैं, जिन पर देश का सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च होता है। सरकार चाहती है कि तेल जैसी जरूरी जरूरतों के लिए विदेशी मुद्रा सुरक्षित रहे, इसलिए फिलहाल सोने की खरीदारी कम करने की अपील की जा रही है।
प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल-डीजल बचाने, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि कठिन समय में जिम्मेदारी से जीवन जीना भी देशभक्ति का हिस्सा है।
क्या सोने की कीमतों में आ सकती है गिरावट?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री की अपील का मनोवैज्ञानिक असर जरूर बाजार पर दिखाई दे सकता है। यदि बड़ी संख्या में लोग कुछ समय तक खरीदारी टालते हैं, तो घरेलू मांग में कमी आ सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव बन सकता है।
हालांकि दूसरी ओर वैश्विक संकट, डॉलर की मजबूती, बढ़ती महंगाई और सुरक्षित निवेश की मांग सोने को लगातार समर्थन भी दे रही है। यही वजह है कि बाजार में उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता दोनों बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- शादी या जरूरी जरूरत के लिए खरीदारी करनी हो तो थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खरीदारी की जा सकती है।
- निवेश के उद्देश्य से खरीदारी करने वाले लोग कुछ समय इंतजार कर सकते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य होने पर सोने की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है।
- लंबी अवधि में सोना अब भी सुरक्षित निवेश माना जा रहा है।
ज्वेलरी बाजार और निवेशकों में बढ़ी चिंता
प्रधानमंत्री की अपील के बाद ज्वेलरी सेक्टर में भी असर दिखाई दिया। कई ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। सर्राफा कारोबारियों का कहना है कि यदि लोगों ने खरीदारी टालनी शुरू की तो आने वाले महीनों में बाजार की मांग प्रभावित हो सकती है। वहीं निवेशकों का एक बड़ा वर्ग अभी भी सोने को सुरक्षित निवेश मान रहा है, क्योंकि वैश्विक संकट के समय पारंपरिक रूप से गोल्ड की मांग बढ़ती रही है।
क्या करें आम लोग?
आर्थिक जानकारों का कहना है कि घबराकर कोई बड़ा फैसला लेने की जरूरत नहीं है। बाजार की स्थिति को देखते हुए समझदारी से निर्णय लेना बेहतर होगा। अगर खरीदारी जरूरी नहीं है तो कुछ समय इंतजार किया जा सकता है। वहीं जिन परिवारों में शादी या अन्य आवश्यक आयोजन हैं, वे बजट और जरूरत के हिसाब से सीमित खरीदारी कर सकते हैं। फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय हालात, कच्चे तेल की कीमतों और सरकार की आर्थिक रणनीति पर निर्भर करेगी।
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